{"product_id":"delhi","title":"DELHI  (दिल्ली)","description":"\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eDELHI  (दिल्ली)\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cspan\u003eशहर की संगमरमर की मीनारों और मंदिर के गुंबदों से निकलता काला धुआं।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eमानवीय पीड़ा की चीखें भारी तोपों से निकली आग की लपटों के नीचे दबी हुई।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eदिल्ली आज सातवीं बार जल रही है, और इस महाअग्नि से किसी का भी बचना है असंभव।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eजब कंपनी की सैन्य टुकड़ी का उफनता सैलाब मुग़ल राजधानी को अपनी गिरफ्त में लेता है, तब स्वतंत्रता सेना पर टूटता है भयानक देवता\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eनिखल-भगवान का क्रोध।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eएक बेकाबू लाल-प्रेत, थिओ मेटकॉफ, एक षड्यंत्र रचता है। टीपू के तहखाने के ख़ौफ़नाक जादू को आज़ाद करता है एक काला दरवेश, वहीं एक स्वयंभू ईसाई धर्मयोद्धा एक अकल्पनीय योजना बनाता है। आख़री तैमूरी की तीसरी ख्वाईश हर रूह में ज़हर घोल देती है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eलुटेरी गढ़सेना और एक निर्मम जनसंहार के बीच खड़ा है तो बस-मस्तान\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eएक दरवेश, एक सिपहसालार, एक शायर, एक बाज़, एक वैश्या, एक पुरोहित, और एक जिन्न। यह आखरी अध्याय है, 1857 की दिल्ली की भयावह कहानी का।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eलेखक: विनीत बाजपेयी \u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Akshardhara Book Gallery","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":67842890694978,"sku":null,"price":315.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0800\/1214\/9058\/files\/dilli-f.jpg?v=1792583174","url":"https:\/\/akshardhara.com\/products\/delhi","provider":"Akshardhara Book Gallery","version":"1.0","type":"link"}